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नज़्म
दयार-ए-इश्क़ में अपना मक़ाम पैदा कर
दयार-ए-इश्क़ में अपना मक़ाम पैदा करनया ज़माना नए सुब्ह ओ शाम पैदा कर
अल्लामा इक़बाल
शे'र
निकल कर ज़ुल्फ़ से पहुँचूँगा क्यूँकर मुसहफ़-ए-रुख़ परअकेला हूँ अँधेरी रात है और दूर मंज़िल है
अकबर वारसी मेरठी
ना'त-ओ-मनक़बत
बा-अदब आओ यहाँ पर है दयार-ए-फ़ातिमाख़ुल्द की भी ख़ुल्द है यारो मज़ार-ए-फ़ातिमा
रफ़ीक़ अशरफ़ी
ना'त-ओ-मनक़बत
दयार-ए-मुस्तफ़वी के सफ़र की बात करोजो कर सको तो मोहम्मद के दर की बात करो
अ'ब्दुल सत्तार नियाज़ी
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ग़ज़ल
दयार-ए-'इश्क़ की दुश्वारियाँ अल-’अज़्मतु लिल्लाहसफ़र पहला मुसाफ़िर बे-ज़बाँ और मुल्क बे-गाना
नुशूर वाहिदी
ना'त-ओ-मनक़बत
तसव्वुर ने दयार-ए-’इश्क़ की मंज़िल पे पहुँचाया'वफ़ा' हम को यही रहबर यही हमदम पसंद आया
अबुल वफ़ा फ़सीही
ग़ज़ल
मुझ से दो-चार 'इश्क़ है साहिब-ए-कार 'इश्क़' हैहमदम दयार-ए-'इश्क़ है 'अक़्ल कहाँ और मैं कहाँ
ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़
नज़्म
हाज़िर हुज़ूर में शो'रा-ए-दयार हैं
हाज़िर हुज़ूर में शो'रा-ए-दयार हैंमद्दाह-ए-हज़रत-ए-शह-ए-आली-वक़ार हैं
फरोग़ वारसी
कलाम
कोई अजनबी-सा दयार था यही वक़्त होगा पहल गएसर-ए-रह-गुज़र वो नज़र मिली तो फ़ज़ा में फूल बिखर गए
अज्ञात
कलाम
अगर ऐ नसीम-ए-सहर तिरा हो गुज़र दयार-ए-हिजाज़ मेंमिरी चश्म-ए-तर का सलाम कहना हुज़ूर-ए-बंदा-नवाज़ में
अख़्तर शीरानी
ग़ज़ल
शहीद-ए-इ’श्क़-ए-मौला-ए-क़तील-ए-हुब्ब-ए-रहमानेजनाब-ए-ख़्वाजः क़ुतुबुद्दीं इमाम-ए-दीन-ओ-ईमाने
वाहिद बख़्श स्याल
सूफ़ी कहावत
रू-ए ज़ेबा मरहम-ए-दिलहा-ए-ख़स्ता अस्त-ओ-कलीद-ए-दरहा-ए-बस्ता
एक ख़ूबसूरत चेहरा दुखी दिलों के लिए मरहम की तरह होता है, और बंद दरवाजों के लिए कुंजी
वाचिक परंपरा
ना'त-ओ-मनक़बत
गुल-ए-बुस्तान-ए-मा'शूक़ी मह-ए-ताबान-ए-महबूबीनिज़ामुद्दीन सुल्तान-उल-मशाइख़ जान-ए-महबूबी


