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निकल कर ज़ुल्फ़ से पहुँचूँगा क्यूँकर मुसहफ़-ए-रुख़ परअकेला हूँ अँधेरी रात है और दूर मंज़िल है
अकबर वारसी मेरठी
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फ़ारसी कलाम
दर ख़ुद चु नेक दीदम तन-ए-‘नस्र’-ओ-जाँ मोहम्मदज़ौक़े ’अजब चशीदम तन-ए-‘नस्र’-ओ-जाँ मोहम्मद
नस्र फुलवारवी
बैत
बदाँ रा नवाज़िश कुन ऐ नेक-मर्द
बदाँ रा नवाज़िश कुन ऐ नेक-मर्दकि सग पास दारद चू नान-ए-तू ख़ुर्द
सादी शीराज़ी
बैत
बद-ओ-नेक रा बज़्ल कुन सीम-ओ-ज़र
बद-ओ-नेक रा बज़्ल कुन सीम-ओ-ज़रकि ईं कस्ब-ए-ख़ैरस्त-ओ-आँ दफ़'अ-ए-शर
सादी शीराज़ी
दोहरा
मुलतानी धनासिरी, एकताला- या हज़रत ख़्वाजा कुतुब साहब, मेरी सुन के नेक न
या हज़रत ख़्वाजा कुतुब साहब, मेरी सुन के नेक न“शाहे-आलम” ख़ादिम तुम्हरो तुम सूं मांगे माल मुल्क
शाह आलम सानी
सूफ़ी उद्धरण
जब इंसान ख़ुद को नेक और अच्छा समझे, तो जान लो कि वो अपनी सब से बुरी हालत में है।
जब इंसान ख़ुद को नेक और अच्छा समझे, तो जान लो कि वो अपनी सब से बुरी हालत में है।
निज़ामुद्दीन औलिया
सूफ़ी उद्धरण
ये बेहतर है कि दूसरों के नेक आमाल को ज़ाहिर किया जाए और उन के बुरे कामों से आँख बचा ली जाए।
ये बेहतर है कि दूसरों के नेक आमाल को ज़ाहिर किया जाए और उन के बुरे कामों से आँख बचा ली जाए।


