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दकनी सूफ़ी काव्य
किस्सासुल अम्बिया
यो पोंचा निस्फ़ जा लग डोल जाकरकठिन दिल कर को शमऊन बिरादर
मोहम्मद ग़ौसी
ना'त-ओ-मनक़बत
अहमद नदीम क़ासमी
ग़ज़ल
मिसल मशहूर है निस्फ़-उल-मुलाक़ात उस को कहते हैंमोहब्बत का है क़ाइम सिलसिला रुसुल-ओ-रसाइल से
क़ैस गयावी
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सूफ़ी लेख
समकालीन खाद्य संकट और ख़ानक़ाही रिवायात
मुझे ये लंबी तम्हीद इसलिए बाँधनी पड़ी ताकि भूक और ख़ुराक की क़िल्लत जैसे आ’लमी बोहरान
रहबर मिस्बाही
सूफ़ी लेख
उ’र्स-ए-बिहार शरीफ़
अस्ल उ’र्स जो ख़ानक़ाह की तरफ़ से होता है ये है कि शब-ए-शशुम को ख़ानक़ाह से
निज़ाम उल मशायख़
सूफ़ी लेख
हज़रत बाबा साहिब की दरगाह-मौलाना वहीद अहमद मसऊ’द फ़रीदी
क़स्बा की बुलंदी पर एक शहीदी दरवाज़ा है। उस से आगे बढ़कर जो मक़बरा है उसें
मुनादी
सूफ़ी लेख
आगरा में ख़ानदान-ए-क़ादरिया के अ’ज़ीम सूफ़ी बुज़ुर्ग
एक दिन हज़रत सय्यिद अपने हुज्रा-ए-ख़ास में तशरीफ़ फ़रमा थे और आपका ख़ादिम आपके दर्वाज़े पर
फ़ैज़ अली शाह
सूफ़ी लेख
आस्ताना-ए-ख़्वाजा ग़रीब-नवाज़ में ख़ुद्दाम साहिब-ज़ादगान, सय्यिद-ज़ादगान औलाद-ए-हज़रत ख़्वाजा सय्यिद फ़ख़्रुद्दीन गर्देज़ी
सिलसिला-ए-चिश्तिया के तमाम मशाइख़ ने ख़ुद को अपने पीर-ओ-मुर्शिद का ख़ादिम ही कहा है।ये एक अलग