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शे'र
निकल कर ज़ुल्फ़ से पहुँचूँगा क्यूँकर मुसहफ़-ए-रुख़ परअकेला हूँ अँधेरी रात है और दूर मंज़िल है
अकबर वारसी मेरठी
ना'त-ओ-मनक़बत
वो बाब-ए-इल्म व ज़ोर-ए-दस्त-ओ-बाज़ू-ए-मोहम्मद थेवो शाह-ए-ज़ुल्फ़िक़ार-ओ-पेशवा-ए-इंस-ओ-जां ठहरे
हैरत शाह वारसी
ना'त-ओ-मनक़बत
वफ़ा का बाब-ए-अबद तक पढ़ा गए हैं हुसैनबचा के दीन को सब घर लुटा गए हैं हुसैन
आबिद अली अत्तारी
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फ़ारसी कलाम
दस्त-ए-तू दस्त-ए-इलाही लहम-ए-तू लहम-ए-नबीऐ ज़िहानत-ए-बाब-ए-’इल्म-ओ-ऐ दिलत उम्मुल-किताब
मौलाना अब्दुल क़दीर सिद्दीक़ी
सूफ़ी उद्धरण
सूफ़ियों के लिए "इल्म-ए-तौहीद" को जानना ज़रूरी है, क्योंकि तरीक़त और हक़ीक़त की बुनियाद इसी इल्म पर है।
मख़दूम अशरफ़ जहांगीर
कलाम
ढूँढ उस जगह किशवर-ए-’अली बाब-ए-’इल्म है’उक़्दा वहीं से होवे है हल मुश्किलात का
मिर्ज़ा मोहम्मद अली फ़िदवी
ना'त-ओ-मनक़बत
तिरा दर है फ़क़ीरों के लिए बाब-ए-करम वारिस'अता कर वारसी सदक़ा मिटा दे रंज-ओ-ग़म वारिस
फ़ना बुलंदशहरी
सूफ़ी उद्धरण
अगर इल्म हासिल करना चाहते हो, तो इंकिसारी से काम लो और जब इल्म हासिल कर लो, तो ख़ुद में और इंकिसारी ले आओ।
अज्ञात
सूफ़ी उद्धरण
वो रियाया अंधी है, जिस में इल्म नहीं है। वो चुप-चाप मुर्दे की तरह ज़ुल्म सहती है, क्योंकि उस के पास इल्म नहीं।
अज्ञात
मल्फ़ूज़
क़ाज़ी हमीदुद्दीन नागौरी
सूफ़ी उद्धरण
आध्यात्मिक ज्ञान (इल्म-ए-बातिनी) की ख़ासियत हैं, नर्मी, खुद को छोटा समझना, रहमदिली और नर्मदिली।
आध्यात्मिक ज्ञान (इल्म-ए-बातिनी) की ख़ासियत हैं, नर्मी, खुद को छोटा समझना, रहमदिली और नर्मदिली।


