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ग़ज़ल
मकतब-ए-इश्क़ में मा’लूम नहीं लेगा कौनदर्स-ए-उफ़्तादगी-ओ-दर्स-ए-फ़ना मेरे बा’द
मौलाना अब्दुल क़दीर सिद्दीक़ी
शे'र
निकल कर ज़ुल्फ़ से पहुँचूँगा क्यूँकर मुसहफ़-ए-रुख़ परअकेला हूँ अँधेरी रात है और दूर मंज़िल है
अकबर वारसी मेरठी
कलाम
मकतब-ए-'इश्क़ में मा'लूम नहीं लेगा कौनदरस-ए-उफ़्तादगी-ओ-दरस-ए-फ़ना मेरे बा'द
मौलाना अब्दुल क़दीर सिद्दीक़ी
फ़ारसी कलाम
निशाँ बर सफ़्हः-ए-हस्ती नबूवद अज़ 'आलम-ओ-आदमकि दिल दर मकतब-ए-'इश्क़ अज़ तमन्ना-ए-तू मन बुर्दम
मख़दूम सादुद्दीन ख़ैराबादी
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ग़ज़ल
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
ग़ज़ल
फ़क़ीर क़ादरी
ग़ज़ल
शहीद-ए-इ’श्क़-ए-मौला-ए-क़तील-ए-हुब्ब-ए-रहमानेजनाब-ए-ख़्वाजः क़ुतुबुद्दीं इमाम-ए-दीन-ओ-ईमाने
वाहिद बख़्श स्याल
सूफ़ी कहावत
रू-ए ज़ेबा मरहम-ए-दिलहा-ए-ख़स्ता अस्त-ओ-कलीद-ए-दरहा-ए-बस्ता
एक ख़ूबसूरत चेहरा दुखी दिलों के लिए मरहम की तरह होता है, और बंद दरवाजों के लिए कुंजी
वाचिक परंपरा
ना'त-ओ-मनक़बत
गुल-ए-बुस्तान-ए-मा'शूक़ी मह-ए-ताबान-ए-महबूबीनिज़ामुद्दीन सुल्तान-उल-मशाइख़ जान-ए-महबूबी
हसरत अजमेरी
सूफ़ी कहानी
हज़रत-ए-उ’मर के पास सफ़ीर-ए-क़ैसर का आना - दफ़्तर-ए-अव्वल
क़ैसर का एक सफ़ीर दूर-दराज़ बयाबानों को तय कर के हज़रत-ए-उ’मर से मिलने को मदीने पहुंचा।
रूमी
ना'त-ओ-मनक़बत
सुल्तान-ए-मन अमीन-ए-मन ज़ीनत-ए-इंतिज़ार-ए-मनआप की दीद-ए-सुकून-ए-दिल दरमाँ दिल-ए-अफ़गार-ए-मन


