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सूफ़ी उद्धरण
मुरीद अगर अपनी ज़ाहिरी शक्ल-ओ-सूरत पीर की तरह न कर सके, तो उस से आगे और क्या होगा।
मुरीद अगर अपनी ज़ाहिरी शक्ल-ओ-सूरत पीर की तरह न कर सके, तो उस से आगे और क्या होगा।
मख़्दूम ख़ादिम सफ़ी
ना'त-ओ-मनक़बत
आशिक़ हैदराबादी
फ़ारसी कलाम
ऐ कि अज़ हर-शक्ल-ओ-हर-सूरत पदीदार आमदीमज़हर-ए-ख़ुद ख़ुद शुदी व ख़ुद ब-इज़हार आमदी
अमीर हसन अला सिज्ज़ी
ना'त-ओ-मनक़बत
ख़ुदा बे-शक्ल था लेनी पड़ी सूरत मोहम्मद कीजो क़ुदरत थी ख़ुदा की बन गई क़ुदरत मोहम्मद की
अज़ीज़ुद्दीन रिज़वाँ क़ादरी
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ना'त-ओ-मनक़बत
दिखाया है ख़ुदा ने जल्वा ख़ुद अहल-ए-बसीरत कोब-शक्ल-ओ-सूरत-ए-इंसाँ जनाब-ए-ख़्वाजा-ए-ख़ानून
ख़्वाजा नाज़िर निज़ामी
कलाम
कहो क्यूँ कर न मेरी शक्ल फिर शक्ल-ए-ख़ुदा ठहरेवही जब हुस्न में ठहरे वही हुस्न-ए-नुमा ठहरे
तसद्दुक़ अ’ली असद
ना'त-ओ-मनक़बत
सीरत-ए-उश्शाक़ है अर्बाब-ए-सूरत से अलगहै तरीक़ा उन का हफ़्ताद-ओ-दो-मिल्लत से अलग
अमीर मीनाई
सूफ़ी लेख
सतगुरू नानक साहिब
क्यों गुरु बाबा इस में आप क्या फ़रमाते हैं? फ़रमाया हम निरंकारी हैं (या’नी बे-शक्ल ख़ुदा
सूफ़ीनामा आर्काइव
दोहरा
बुल्ल्हआ जैसी सूरत ऐन दी, तैसी सूरत ग़ैन।
बुल्ल्हआ जैसी सूरत ऐन दी, तैसी सूरत ग़ैन।इक नुक्कते दा फेर है , भुल्ला फिरे जहान ।
बुल्ले शाह
कलाम
उस यार ने अपनी शक्ल दिखा आख़िर को काम तमाम कियादिल मुफ़्त में मेरा छीन लिया आख़िर को काम तमाम किया
मख़्दूम ख़ादिम सफ़ी
ना'त-ओ-मनक़बत
अजमेर को ख़्वाजा तोरी सूरत सपने में दिखा एक नजरियातोरा दर्शनवा देखन मोरा जिया तरसत है ओ साँवरिया