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सूफ़ी उद्धरण
एक फ़क़ीर का फ़क़्र और ख़ुदा पर भरोसा इतना मज़बूत होता है कि दुनिया की कोई भी चीज़ उसे हिला नहीं सकती और उसकी एक साँस में दोनों जहां नहीं समा सकते।
बहाउद्दीन ज़करिया मुल्तानी
सूफ़ी उद्धरण
हसद की दो क़िस्में हैं - पहली हसद, जो इंसान की इंसान के लिए हसद है और दूसरी इलाही हसद, जो दिलों के लिए है। इलाही हसद इंसान की साँसों के लिए है, ताकि इंसान ख़ुदा के सिवा किसी और के लिए एक भी साँस ज़ाया न करे।
अबू बक्र शिबली
शे'र
साँस में आवाज़-ए-नय है दिल ग़ज़ल-ख़्वाँ है 'ज़हीन'शायद आने को है वो जान-ए-बहाराँ इस तरफ़
ज़हीन शाह ताजी
गीत
मों से साँस लिए नाहीं जायो भयो चोला दरीदा-दरीदाआज साजन मोरे घर आयो देखो पाती रसीदा-रसीदा
हिल्म आग़ाई अबुलउलाई
दोहा
'औघट' चेला वह गुणी जो बिन गुरु तजै न साँस
'औघट' चेला वह गुणी जो बिन गुरु तजै न साँससोते जगते ध्यान रहे गुरु को राखे पास