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फ़ारसी कलाम
साक़ी-ए-फ़र्रूख़-ए-रुख़-ए-मन जाम चू गुलनार ब-देहबहर-ए-मन अर मी न-देही बह्र-ए-दिल-ए-यार ब-देह
रूमी
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
साक़ी-ए-फ़र्ख़ुन्द:-रू ख़ेज़- व ब-देह जाम रावज़ मय-ए-ख़ुद मस्त कुन ईं दिल-ए-नाकाम रा
अहमद शाहजहाँपुरी
कलाम
इक जाम खनकता जाम कि साक़ी रात गुज़रने वाली हैइक होश-रुबा इनआ'म कि साक़ी रात गुज़रने वाली है
क़तील शिफ़ाई
ग़ज़ल
मोहम्मद समी
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पद
अब इश्क़ का उस के जाम पिया है जो होए सो होए
अब इश्क़ का उस के जाम पिया है जो होए सो होएअब दिल को उस का राम किया है जो होए सो होए
कवि दिलदार
ग़ज़ल
दिए साक़ी ने मुझ को चंद जाम आहिस्तः आहिस्तःहुआ ये दौर-ए-मय आख़िर तमाम आहिस्तः आहिस्तः
अज़ीज़ सफ़ीपुरी
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
सालहा दिल-तलब-ए-जाम-ए-जम अज़ मा मी-कर्दआँ-चे ख़ुद दाश्त ज़े-बेगान: तमन्ना मी-कर्द
हाफ़िज़
कलाम
न हिकायत-ए-ग़म-ए-'इश्क़ है न हदीस-ए-साग़र-ओ-जाम हैतिरा मय-कदा है वो मय-कदा जहाँ लफ़्ज़-ए-होश हराम है
कौसर आरफ़ी
ग़ज़ल
हिकमत से ये ख़ाली नहीं लबरेज़ साक़ी जाम करदौर-ओ-तसलसुल में न फँस दीवानगी में नाम कर
ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़
पद
फ़ज़्ल करम से अपने साक़ी दे हम को एक जाम भला
फ़ज़्ल करम से अपने साक़ी दे हम को एक जाम भलाहो जिस से जमईयत-ए-ख़ातिर अपना हो सब काम भला

