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सूफ़ी उद्धरण
चाहिए कि किसी से इल्मी बहस में झगड़ा न करो और तकलीफ न पहुँचाओ। अगर ये समझ लो कि दूसरा हक़ की तरफ़ है, तो उस की बात मान लो और अगर ऐसा नहीं है तो उस को दो-तीन बार समझाओ। अगर न माने तो कहो कि मुझे तो यही मालूम है, मुमकिन है कि जैसा तुम कहते हो वैसा ही हो, फिर झगड़ने की बात क्या है।
शैख़ अब्दुल हक़ देहलवी
सूफ़ी लेख
क़व्वाली का ‘अह्द-ए-ईजाद और मक़्सद-ए-ईजाद
क़व्वाली की ईजाद अमीर ख़ुसरो के ‘अह्द-ए-हयात 1253 ता 1325 के ठीक दरमियान का ‘अह्द है,
अकमल हैदराबादी
ग़ज़ल
तोड़ कर अ'ह्द अपना वो बद-अ’हद चलता हो गयामैं तो क्या समझा हुआ था या-ख़ुदा क्या हो गया
शाह अकबर दानापूरी
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बैत
अ’हद-ए-रफ्ता की खुदाई किस क़दर महँगी पड़ी
अ’हद-ए-रफ्ता की खुदाई किस क़दर महँगी पड़ीजिस जगह ऊँची इ’मारत थी गढ़ा सा रह गया
मुज़फ़्फ़र वारसी
कलाम
इमदाद अली उल्वी
कलाम
सरज़मीन-ए-चिश्त की आब-ओ-हवा कुछ और हैदीन-ओ-दुनिया से निराला और ही कुछ तौर है
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
कलाम
मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और हैसर-ए-आईना मिरा 'अक्स है पस-ए-आईना कोई और है
सलीम कौसर
शे'र
कहीं है अ’ब्द की धुन और कहीं शोर-ए-अनल-हक़ हैकहीं इख़्फ़ा-ए-मस्ती है कहीं इज़हार-ए-मस्ती है