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शे'र
जिगर मुरादाबादी
दकनी सूफ़ी काव्य
खुशनामा
सिफ़त करूँ मैं अल्ला कूँ बड़ा जो पूरन पूरक़ादिर कुदरत अज्ञात कार नेरे न दूर
शाह मीराजी शम्सुल शाख़
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दकनी सूफ़ी काव्य
शहादतुल हक़ीक़त
हमी बोल अरबी करे और फ़ारसी बहुतेरेयों हिन्दवी बोली तब इस अर्थ भावे सब
शाह मीराजी शम्सुल शाख़
साखी
प्रेम का अंग - प्रेम बिना धीरज नहीं बिरह बिना बैराग
प्रेम बिना धीरज नहीं बिरह बिना बैरागसतगुरु बिन जावै नहीं मन मनसा का दाग़
कबीर
ग़ज़ल
जिगर मुरादाबादी
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
बुलबुले बर्ग-ए-गुले-ख़ुश-रंग दर मिंक़ार दाश्तवंदर आँ-बर्ग-ओ-नवा-ख़ुश-नालः-हा-ए-ज़ार दाश्त
हाफ़िज़
शे'र
अज़ीज़ सफ़ीपुरी
ग़ज़ल
हक़ीक़त उस बला-नोश-ए-अज़ल की शैख़ क्या जानेजिसे तख़्लीक़-ए-हस्ती में फ़रिश्ते तक न पहचाने
आक़िल रेवाड़वी
शे'र
मौसम-ए-होली है दिन आए हैं रंग और राग केहम से तुम कुछ माँगने आओ बहाने फाग के



