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सूफ़ी लेख
बीसवीं सदी के चंद मशहूर क़व्वाल
बीसवीं सदी के चंद क़व्वाल चूँकि कुल हिंद शोहरत के मालिक रहे, इसलिए मैं उनमें से
अकमल हैदराबादी
पद
रामानन्द के दास कबीरा नामदेव भक्तन में शूरा
रामानन्द के दास कबीरा नामदेव भक्तन में शूराकलियुग में नीसान बजाया निराकार का पंथ चलाया
भाऊदास जी
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ग़ज़ल
था मौज-ए-दर्द में पैग़ाम-ए-वस्ल-ए-यार क्या कहिएवहीं था दामन-ए-साहिल जहाँ साहिल नहीं समझा
फ़ना बुलंदशहरी
शबद
शूरा ताही जानिये लड़े धनी के हेत
शूरा ताही जानिये लड़े धनी के हेतपुरजा पुरजा होय पड़े तहूँ न छाड़े खेत
लालदास
अरिल्ल
अरिल छंद - माया मोह के साथ सदा नर सोइया
माया मोह के साथ सदा नर सोइयाआखिर ख़ाक निदान सत्त नहिं जिया
गुलाल साहब
फ़ारसी कलाम
अज़ हुस्न-ए-मलीह-ए-ख़ुद शोरे ब-जहाँ कर्दीहर ज़ख़्मी-ए-बिस्मिल रा मसरूफ़-ए-फ़ुग़ाँ कर्दी
अकबर वारसी मेरठी
ग़ज़ल
महमूद आलम
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
दर्द-ए-दिल-ए-आशिक़ रा ईसा न-कुनद चारःदरमाँ न-देहद सौदे सौदा-ए-मोहब्बत रा
हज़ीं ज़ैदपुरी
साखी
बिरह का अंग - जो जन बिरही नाम के सदा मगन मन माहिँ
जो जन बिरही नाम के सदा मगन मन माहिँज्यों दर्पन की सुंदरी किनहूँ पकड़ी नाहिं