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सूफ़ी उद्धरण
मन भटक रहा है। किस के कहने से सो रहा है? यह ज़िंदगी कुछ दिनों की है और तू अपने दिमाग़ को सुस्त करके सो रहा है? सोच-समझ कर काम ले और ज़िंदगी का मक़सद समझने की कोशिश कर।
सय्यद मोहम्मद ताजुद्दीन
कलाम
कभी फ़ानूस-ए-काफ़ूरी में छुप कर जगमगाता हैकभी वीरानों खेतों पर घटाएँ बन के छाता है
अहमद नदीम क़ासमी
कलाम
’आलम-ए-सूरत का छुप जाना 'अयाँ हो जाएगाये मुरक़्क़ा' इक दिन आँखों से निहाँ हो जाएगा