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सूफ़ी उद्धरण
दरवेशों की हड्डियों में, इश्क़-ए-इलाही के चलते अनगिनत सुराख़ होते हैं।
दरवेशों की हड्डियों में, इश्क़-ए-इलाही के चलते अनगिनत सुराख़ होते हैं।
शैख़ सलीम चिश्ती
ग़ज़ल
अपनी फ़ितरत से मगर मजबूर है तालिब तिरादूर है मंज़िल से वो ख़ुद रह के मंज़िल के क़रीब
अब्दुल रब तालिब
ना'त-ओ-मनक़बत
फ़ातिमा ज़हरा के दिलबर 'अली मौला के प्यारेपरतव-ए-अहमद-ए-मुख़्तार हैं ग़ौस-ए-आ'ज़म
आमिर रहमती
ग़ज़ल
न जाने कब मयस्सर हो विसाल-ए-यार ऐ 'मन्नन'कि उस के हिज्र में अपना दिल-ए-बिस्मिल परेशाँ है
मिर्ज़ा फ़िदा अली शाह मनन
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ना'त-ओ-मनक़बत
अहल-ए-सफ़ा के दीन का क़िब्ला हुसैन हैंअहल-ए-नज़र के वास्ते का'बा हुसैन हैं
सय्यद फ़ैज़ान वारसी
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
ऐ तालिब-ए-फ़िरदौस ब-रौ सू-ए-मोहम्मदचूँ ख़ुल्द-ए-बरीं आमदः दर कू-ए-मोहम्मद
अमीर हसन अला सिज्ज़ी
ना'त-ओ-मनक़बत
दुनिया का हूँ तालिब न बहिश्त-’अदनी कादीवाना हूँ मैं सय्यद-ए-मक्की मदनी का
शब्बीर साजिद मेहरवी
ग़ज़ल
क़त्ल के वक़्त कहा मुझ से दम-ए-ख़ंजर ने'इश्क़' शाबाश तुझे किस से निबाही अब तक
ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़
शे'र
इलाही रंग ये कब तक रहेगा हिज्र-ए-जानाँ मेंकि रोज़-ए-बे-दिली गुज़रा तो शाम-ए-इंतिज़ार आई
हसरत मोहानी
ना'त-ओ-मनक़बत
ख़ुद ख़ुदा तालिब हुआ है बारहा दीदार काख़ुद समझ लो कैसा होगा हुस्न-ए-रू-ए-यार का
सलमान आरिफ़ बरेलवी
ना'त-ओ-मनक़बत
मुस्तफ़ा के दीन की बक़ा मिरे हुसैन हैंया'नी राज़-ए-वहदत-ए-ख़ुदा मिरे हुसैन हैं
आमिर रहमती
कलाम
पै-ता'ज़ीम उठती है क़ियामत कू-ए-जानाँ मेंअजल कहती है बिस्मिल्लाह जहाँ वो पाँव धरते हैं
दाग़ देहलवी
ना'त-ओ-मनक़बत
ऐसा तालिब नहीं है कोई जैसा हक़ ता'ला हैकोई नहीं महबूब ऐसा जैसा कमली वाला है
अ'ब्दुल सत्तार नियाज़ी
कलाम
उन ने कहा ये मुझ से अब छोड़ दुख़्त-ए-रज़ कोपीरी में ऐ दिवाने ये कौन मस्तियाँ हैं