ऐ आयत-ए-मुसहफ़-ए-इलाही
ऐ आयत-ए-मुसहफ़-ए-इलाही
तुग़रा-ए-मिसाल-ए-बादशाही
ऐ कलाम-ए-इलाही की आयत और शाही फरमान की मिसाल।
दर तुस्त हर आँचे बूद-ओ-बाशद
मलक-ओ-मलकूत हर चे ख़्वाही
जो है और जो होगा और जो कुछ भी हुकूमत और बादशाही है वह सब तेरे दम से है।
अनवार-ए-ख़ुदा ब-चश्म-ए-ग़ैरत
दीदेम ब-सूरत-ए-माही
हमने नूर-ए-ख़ुदा को रश्क से उसकी अपनी शक्ल में देखा।
ख़ूबाँ जहाँ असीर-ए-पेश्त
ज़ेरा कि अमीर हर सिपाही
दुनिया के सभी नेक लोग तुम्हारे सामने असीर हैं क्योंकि तुम हर लश्कर के सरदार हो।
बर क़द्द-ए-ख़ुश्त क़बा-ए-ख़ूबी
रास्त आमद अज़ आँ-कि कज कुलाही
सच है कि तेरे ऊँचे क़द और क़ामत पर यह लिबास, लिबास-ए-शाही की तरह नुमायाँ हो रहा है।
अज़ रोज़ः हज़ार बार ख़ुश-तर
बा-यार शराब-ए-सुब्ह-गाही
रोज़ा रखने से हज़ार गुना यह बेहतर है कि महबूब के साथ सुबह को शराब नोशी की जाए।
बे-याद-ए-तू शर्बते कि नोशम
दर मशरब-ए-मास्त अज़ मनाही
तेरी याद के बग़ैर मैं जो शराब पीता हूँ, उसको पीने की हमें मनाही है।
'अहमद' चु ज़-वस्फ़-ए-गश्त: 'आजिज़
आमद बर तू ब-’उज़्र ख़्वाही
वह अहमद, जिसके पास बयान करने के काबिल कोई ख़ूबी नहीं है, वह माफ़ी माँगने के लिए आपके पास आया है।
- पुस्तक : अर्मग़ान-ए-बिहार शरीफ़ हज़रत अहमद लंगर दरिया बलख़ी की हयात और शाइ’री और मलफ़ूज़ात का तंक़ीदी जाएज़ा (पृष्ठ 86)
- रचनाकार : डॉक्टर हसन इमाम
- प्रकाशन : लेबल आर्ट प्रेस शाह गंज़, महिंदर रोड, पटना (1998)
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