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ना'त-ओ-मनक़बत
या तोक़-ए-मुहब्बत है या इ'श्क़ की ज़ंजीरेंआता है अ'जब धज से दीवाना मोहम्मद का
कामिल शत्तारी
ग़ज़ल
ब-ज़ाहिर देखने में होती है सज-धज फ़क़ीरानादिमाग़ उन के गदाओं का मगर शाहाना होता है
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
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ग़ज़ल
ब-ज़ाहिर देखने में होती है सज-धज फ़क़ीरानादिमाग़ उन के गदाओं का मगर शाहाना होता है
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
ना'त-ओ-मनक़बत
गुमान-ए-रहमतुल-लिल-’आलमीं उन पर न क्यूँ गुज़रेवही नक़्शा वही सज-धज वही तस्वीर-ए-क़ुरआनी
कामिल शत्तारी
कृष्ण भक्ति संत काव्य
बाँकी सज-धज ठाठ अनोखे चंचल चाल प्यारी बतियाँसाँवली सूरत में रसीले तिरछी चितवन झल-बल न्यारी