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सूफ़ी उद्धरण
शिकस्ता क़ब्रों में ग़ौर कर, कैसे-कैसे हसीनों की मिट्टी ख़राब हो रही है।
शिकस्ता क़ब्रों में ग़ौर कर, कैसे-कैसे हसीनों की मिट्टी ख़राब हो रही है।
शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी
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विषय
दिल
दिल
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फ़ारसी सूफ़ी काव्य
ऐ दिल म-बाश ख़ाली यक-दम ज़े-इश्क़-ओ-मस्तीवाँगह ब-रौ कि रस्ती अज़ नेस्ती-ओ-हस्ती
