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सूफ़ी कहावत
क़द्र-ए-ज़र ज़रग़र शनासद क़द्र-ए-गौहर गौहरी
सुनार को सोने की क़द्र होती है, और जौहरी जवाहरात की क़द्र को जानता है।
वाचिक परंपरा
शबद
भेद का अंग - झरि लागै महलिया गगन घहराय
भेद का अंग - झरि लागै महलिया गगन घहरायझरि लागै महलिया गगन घहराय
महात्मा धनी धर्मदास जी
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सलोक
फ़रीदा घरे दमामे मउत दे सगलि जहान सुने
फ़रीदा घरे दमामे मउत दे सगलि जहान सुनेजगु छतीह वपारे घाहै वागु लुने
बाबा फ़रीद
ना'त-ओ-मनक़बत
घिरा हूँ मैं मुसीबत में बचा लो या रसूल-अल्लाहमेरी बिगड़ी हुई दुनिया बना दो या रसूल-अल्लाह
नक़ीब-उल-रहमान हसनी
पद
आँख खोल के देखो तो सब एक ज़ात से घेरी है
आँख खोल के देखो तो सब एक ज़ात से घेरी हैजा से नूर हुआ है दिन को वा से रात अँधेरी है
कवि दिलदार
पद
श्री ब्रन्दावन मो यदुराज बिराजत है
मृदंग नवघन घोर गरज पखवाज राज सीताज ताज कीआवाज़ गहरे थरन होत यत झनन झनन झनन झांजरी
अमृत राय
ना'त-ओ-मनक़बत
ज़माने भर को दारु-ए-शिफ़ा इस दर से मिलती हैहम अपने दिल के गहरे ज़ख़्म दिखलाने कहाँ जाते
