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ना'त-ओ-मनक़बत
अली हुसैन अशरफ़ी
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ना'त-ओ-मनक़बत
अमीर बख़्श साबरी
क़िता'
जुनून-ए-'आशिक़ी में अपना दामन चाक कर लेतेग़म-ए-कौन-ओ-मकाँ से अपने दिल को पाक कर लेते
फ़ना बुलंदशहरी
ना'त-ओ-मनक़बत
कामिल शत्तारी
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
ब-शगुफ़्त गुल दर बोस्ताँ आँ गुंचः-ए-ख़ंदाँ कुजाशुद वक़्त-ए-ऐश-ए-दोस्ताँ आँ लाल: बुस्ताँ कुजा
अमीर ख़ुसरौ
शे'र
देखे जो यक-ब-यक गुल-रू तुम्हारी बे-हिजाबी हममिसाल-ए-बुलबुल-ए-शैदा किए अपनी ख़राबी हम
तुराब अली दकनी
ग़ज़ल
ग़ैर जो बे-फ़ाइदा हाथों पे गुल खाया किएहम भी नाहक़ दाग़ अपने दिल के थे दिखलाया किए
ख़्वाजा मीर दर्द
ग़ज़ल
देखे जो यक-ब-यक गुल-रू तुम्हारी बे-हिजाबी हममिसाल-ए-बुलबुल-ए-शैदा किए अपनी ख़राबी हम
तुराब अली दकनी
ना'त-ओ-मनक़बत
महशर में अगर उठ्ठूँ दामन में छुपा जानाजो अश्क बहे मेरे रहमत से मिटा जाना
सय्यद अमजद हुसैन
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
गुल दर बर व मय दर कफ़ व मा'शूक़ः ब-कामस्तसुल्तान-ए-जहानम ब-चुनींं रोज़-ए-ग़ुलामस्त






