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ग़ज़ल
भट्टी को चला क्या होते सहर पूछो तो कोई 'सज्जाद' सतीथा रात तलक तो काम उस को अश्ग़ाल सती औराद सती
ग़ुलाम नक़्शबंद सज्जाद
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फ़ारसी सूफ़ी काव्य
लौलाक कि नाज़िल शुद: दर शान-ए-मोहम्मदजुज़्वीस्त ज़े-औसाफ़-ए-फ़रावान-ए-मोहम्मद
शाह तुराब अली क़लंदर
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
कि बूद हव्वा कुदाम आदम ख़बर ज़े राज़े कि हस्त दारममनम कि रूही ब-तन दमीदम मनम मोहम्मद मनम मोहम्मद
अज़ीज़ सफ़ीपुरी
ना'त-ओ-मनक़बत
मोहम्मद मुस्तफ़ा जिन को कि हक़ का मुद्द'आ कहिएनुबुव्वत की उन्हीं को इब्तिदा-ओ-इंतिहा कहिए
शाह हिलाल अहमद क़ादरी
ना'त-ओ-मनक़बत
यहाँ मोहम्मद वहाँ मोहम्मद इधर मोहम्मद उधर मोहम्मदजहाँ भी देखा निगाह-ए-दिल ने वहीं पे आए नज़र मोहम्मद
नसीर सिराजी
ना'त-ओ-मनक़बत
ज़िया दीदा-ए-हक़बीं है रूख़्सारा मोहम्मद काकि है अल्लाह का दीदार नज़्ज़ारा मोहम्मद का
अज्ञात
ना'त-ओ-मनक़बत
शम्सुज़्ज़हा मोहम्मद बदरुद्दुजा मोहम्मदनूर-उल-हुदा मोहम्मद कहफ़ुल-वरा मोहम्मद
ज़हीन शाह ताजी
ना'त-ओ-मनक़बत
कुछ ऐसे दहर में छाया है मय-ख़ाना मोहम्मद काकि हर कोई हुआ जाता है मस्ताना मोहम्मद का
मोहम्मद हुज़ैफ़ा
ना'त-ओ-मनक़बत
किस कैफ़ में डूबे हैं दीवाने मोहम्मद केपी पी के जिए जाते हैं मस्ताने मोहम्मद के
अमीर बख़्श साबरी
ना'त-ओ-मनक़बत
सर-ए-मैदान-ए-ताएफ़ एक मर्द-ए-नैनवाई कोमोहम्मद मुस्तफ़ा का गेसू-ए-पर-ख़म पसंद आया