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शे'र
ख़ुदा शाहिद है इस शम्‘अ-ए-फ़रौज़ाँ की ज़िया तुम होमैं हरगिज़ ये नहीं कहता तुमहें मेरे ख़ुदा तुम हो
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
क़िता'
वो निगाह-ए-मस्त की गर्दिशें कि हज़ार जाम निसार होंवही दौर बादा-ए-बे-सुबू तुम्हें याद हो कि न याद हो
आरिफ़ बलियावी
ग़ज़ल
शहीद आँखों में नूर बन कर ये कौन तेरे समा रहा हैतलाश जिस की थी तुझ को नादाँ वही तो जल्वा दिखा रहा है
पीर अब्दुल शकूर शहीद
ना'त-ओ-मनक़बत
हम हुए सैराब 'इश्क़-ए-मुस्तफ़ा के जाम सेइस लिए वाबस्तगी अपनी है ख़ास-ओ-'आम से




