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दोहा
'औघट' घट में प्राण बसे और प्राण बीच इक चोर
'औघट' घट में प्राण बसे और प्राण बीच इक चोरजो पकड़े उस चोर को वो जोगी बर जोर
औघट शाह वारसी
ग़ज़ल
चित चोर लियो मन मोह लियो किरपा जो भई मो पे साजन कीभई मैं तो दीवानी ऐ री सखी छब देख के वा के नैनन की
मंज़ूर आरफ़ी
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राग आधारित पद
राग धनाश्री - हरि कत भये ब्रज के चोर
हरि कत भये ब्रज के चोरतुम्हरे मधुप वियोग राधे मदन के झकझोर
सूरदास
शे'र
दीन-ओ-मज़हब से तिरे आशिक़ को अब क्या काम हैवो समझता ही नहीं क्या कुफ़्र क्या इस्लाम है
इरफ़ान इस्लामपुरी
ग़ज़ल
दीन-ओ-मज़हब से तिरे आशिक़ को अब क्या काम हैवो समझता ही नहीं क्या कुफ़्र क्या इस्लाम है
आ’रिफ़ इस्लामपुरी
ना'त-ओ-मनक़बत
सज्जाद अहसन
ग़ज़ल
बेदम शाह वारसी
ग़ज़ल
दिल-ए-बे-क़रार की मा'रिफ़त बड़ी एहतियात का काम हैयही उन की ख़ल्वत-ए-नाज़ है यही दूसरों का मक़ाम है
