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कवित्त
माफ किया मुलुक मताह दी विभीषन को
माफ किया मुलुक मताह दी विभीषन को,कही थी जुबान कुरबान ये करार की।
कारे ख़ान फ़क़ीर
कवित्त
छल बल करि थाक्यो अनेक गजराज भारी
छल बल करि थाक्यो अनेक गजराज भारी,भयो बल हीन जब नेक न छुड़ा गयो।
कारे ख़ान फ़क़ीर
सूफ़ी कहावत
आतिश निशान्दन ओ अख़गर गुज़ाश्तन कार-ए-ख़िरदमंदां नीस्त
एक बुद्धिमान व्यक्ति आग को बुझाने के बाद आग की चिंगारी नहीं छोड़ता।
वाचिक परंपरा
सूफ़ी कहावत
चराग़-ए- के ऊ ख़ानः रौशन कुनद बरूख़त उफ़्ताद कार-ए-दुश्मन कुनद
वो चिराग जो घरों को रोशनी देता है, अगर वह किसी के कपड़ों पर गिरे, तो दुश्मन की तरह काम करेगा।
वाचिक परंपरा
पद
सुरत की प्रगति - आज घिर आये बादल कारे गरज गरज घन गगन पुकारे
आज घिर आये बादल कारे गरज गरज घन गगन पुकारेरिम-झिम बरसत बूँद अमी की बिजली चमक घट नैन निहारे
शालीग्राम
ना'त-ओ-मनक़बत
क्या करे अंदाज़ा-ए-रिफ़’अत निगाह-ए-ज़ाहिरीहै यहाँ पर भी फ़रोज़ाँ शम'-ए-बज़्म-ए-क़ादिरी
