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ग़ज़ल
वसवसे आते नहीं ये मर्द-ए-कामिल के क़रीबदूर है मंज़िल से वो या है वो मंज़िल के क़रीब
अब्दुल रब तालिब
ना'त-ओ-मनक़बत
नबी जितने क़रीब 'अर्श-ए-आ'ज़म होते जाते हैंज़रिए' बख़्शिश-ए-उम्मत के मोहकम होते जाते हैं
अब्र अहसनी
सूफ़ी उद्धरण
वो ख़ुदा से बहुत क़रीब है, जो ख़ुश-ख़ल्क़ और दूसरों का बोझ उठाता है।
वो ख़ुदा से बहुत क़रीब है, जो ख़ुश-ख़ल्क़ और दूसरों का बोझ उठाता है।
बायज़ीद बस्तामी
ग़ज़ल
उस को जब ढूँढा तो वो निकला रग-ए-जाँ के क़रीबऔर ज़मीन-ओ-आसमाँ को फ़ास्ला समझा था मैं
आरिफ़ सीमाबी बनकोटी
ना'त-ओ-मनक़बत
न कहीं से दूर हैं मंज़िलें न कोई क़रीब की बात हैजिसे चाहें उस को नवाज़ दें ये दर-ए-हबीब की बात है
मुनव्वर बदायूँनी
शे'र
गिर्या-ए-फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ का वक़्त आ पहुँचा क़रीबऐ गुलो देखो ये बे-मौक़ा' हँसी अच्छी नहीं
मुज़तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
जो याँ कुछ चाहने वाले क़रीब-ए-यक-दिगर बैठेहम अपना दिल बग़ल में दाब लेकर आह कर बैठे