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ना'त-ओ-मनक़बत
वैसे तो खिलाता है हर इक सहन-ए-चमन फूलमहफ़ूज़ ख़िज़ाँ है मिरे आक़ा का बदन फूल
डॉ. मंसूर फ़रीदी
ग़ज़ल
आँख खुलते ही था इक जल्वा नज़र के सामनेक्या कहूँ मैं आगया क्या क्या नज़र के सामने
इम्दाद अ'ली उ'ल्वी
ना'त-ओ-मनक़बत
शाहबाज़-ए-ला-मकानी आप ही के फ़ैज़ सेमंक़बत के फूल खिलते हैं मिरे अश'आर में
इश्तियाक़ आलम ज़िया शहबाज़ी
ना'त-ओ-मनक़बत
धारे चलते हैं 'अता के वो है क़तरा तेरातारे खिलते हैं सख़ा के वो है ज़र्रा तेरा
अहमद रज़ा ख़ान
ग़ज़ल
अ'जब शादाब है लाखों गुल-ए-ज़ख़्म इस में खिलते हैंनिहाल-ए-दिल मिरा सींचा हुआ है आब-ए-पैकाँ का
शौक़ नीमवी
ग़ज़ल
मा-वरा हैं दोस्त मेहर-ओ-माह की मंज़िल से हमदहर पर खिलते तो हैं लेकिन बड़ी मुश्किल से हम
अदीब सहारनपुरी
नज़्म
राखी
कहाँ नाज़ुक ये पहूँची और कहाँ रंग मिलते हैंचमन में शाख़ पर कब इस तरह के फूल खिलते हैं
नज़ीर अकबराबादी
कलाम
कलिमा जो नहीं पढ़ता मोमिन नहीं कहलाताजो शिर्क नहीं करता जन्नत में नहीं जाता