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सूफ़ी उद्धरण
अक्सर लोग ज़िंदगी की ज़बान सीखे बग़ैर, ज़िंदगी की किताब पढ़ना शुरू कर देते हैं।
अक्सर लोग ज़िंदगी की ज़बान सीखे बग़ैर, ज़िंदगी की किताब पढ़ना शुरू कर देते हैं।
वहीदुद्दीन ख़ाँ
ग़ज़ल
कोई ब-सद ग़ुरूर-ओ-नाज़ जल्वा-नुमा हुआ तो क्याचश्म-ए-मुराद-मंद को मिल गया मुद्दआ' तो किया
बहज़ाद लखनवी
कलाम
यार ख़ुद जल्वा-नुमा था मुझे मा'लूम न थाग़ुंचा-ओ-गुल में बसा था मुझे मा'लूम न था