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बसंत
फिर जनाब-ए-आसिफ़-ए-दौराँ में बा-सद 'ऐश-ए-नाज़हो गई आ कर के मसरूफ़-ए-जबीं-साई बसंत
ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी
बसंत
मुझ़दा-ए-फ़स्ल-ए-जुनूँ मस्तों को फिर लाई बसंतदिन गए फिर और रुत पल्टी कि फिर आई बसंत
ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी
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शे'र
शब जो होली की है मिलने को तिरे मुखड़े से जानचाँद और तारे लिए फिरते हैं अफ़्शाँ हाथ में
ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी
ना'त-ओ-मनक़बत
औज-ए-विलायत के हो माह तख़्त-ए-ख़िलाफ़त के हो शाहदीन-ए-मोहम्मद की पनाह ऐ बादशाह-ए-अस्फ़िया
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
शे'र
निकल कर ज़ुल्फ़ से पहुँचूँगा क्यूँकर मुसहफ़-ए-रुख़ परअकेला हूँ अँधेरी रात है और दूर मंज़िल है
अकबर वारसी मेरठी
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
ग़ुलाम-ए-इश्क़म व लुत्फ़-ओ-करम बहा-ए-मन अस्तकसे कि बन्द: ब-ख़्वानद मरा ख़ुदा-ए-मन अस्त
मिर्ज़ा मज़हर जान-ए-जानाँ
कलाम
मुझ मुज्रिम-ए-उल्फ़त को जो चाहो वो सज़ा दोमैं हाज़िर-ए-दरबार हूँ ऐ जान-ए-तमन्ना