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रोटी न पेट में हो तो फिर कुछ जतन न होमेले की सैर ख़्वाहिश-ए-बाग़-ओ-चमन न हो
आया था किसी शहर से इक हंस विचारा।एक पेड़ पै जंगल के किया उससे गुज़ारा।।
रश्क-ए-गुल दस्त-ए-हिनाई कि कहे देख चमनहो रक़म किस क़लम-ए-शौक़ से ऐ गुंचः-ए-दहन
चलि आती है अब तो हर कहीं बाज़ार की राखीसुनहरी सब्ज़ रेशम ज़र्द और गुलनार की राखी
अब तो हर बाग़ में आती है चली नारंगीहै हर एक पेड़ पे मिस्री की डली नारंगी
क्या अब्र की गर्मी में घड़ी पहर है उमसगर्मी के बढ़ाने की अजब लहर है उमस
देखा तो आदमी ही यहाँ मिस्ल-ए-रांग हैफ़ौलाद से गढ़ा है सो है वो भी आदमी
टुक हिर्स-ओ-हवा को छोड़ मियाँ मत देस बिदेस फिरे माराक़ज़्ज़ाक़ अजल का लूटे है दिन रात बजा कर नक़्क़ारा
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