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फ़ारसी सूफ़ी काव्य
अंदरीं महफ़िल ज़े-बस गर्म-ए-बयानम कर्द:अन्दशम्अ' साँ हर ’उज़्व-ए-मन सर्फ़-ए-ज़बानम कर्द:अन्द
ख़्वाजा मीर दर्द
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ग़ज़ल
ख़ुदा ही जानता है देखने वालों ने क्या देखागया जो उन की महफ़िल में हुआ वो उन की महफ़िल का
अफ़सर सिद्दीक़ी अमरोहवी
ग़ज़ल
तिरी महफ़िल में फ़र्क़-ए-कुफ़्र-ओ-ईमाँ कौन देखेगाफ़साना ही नहीं कोई तो उ’न्वाँ कौन देखेगा
अज़ीज़ वारसी देहलवी
गीत
तेरी महफ़िल में क़िस्मत आज़मा कर हम भी देखेंगेघड़ी-भर को तेरे नज़्दीक आ कर हम भी देखेंगे
शकील बदायूँनी
ना'त-ओ-मनक़बत
अ'ब्दुल सत्तार नियाज़ी
ना'त-ओ-मनक़बत
विलायत का हुआ ऐ'लाँ ग़दीर-ए-ख़ुम की महफ़िल मेंसजा है मिम्बर-ए-सुल्ताँ ग़दीर-ए-ख़ुम की महफ़िल में
सय्यद हसन अहमद
ना'त-ओ-मनक़बत
विलायत का हुआ ऐ'लाँ ग़दीर-ए-ख़ुम की महफ़िल मेंरसूल-अल्लाह हैं गुल-अफ़शाँ ग़दीर-ए-ख़ुम की महफ़िल में
सय्यद फ़ैज़ान वारसी
शे'र
महफ़िल इ’श्क़ में जो यार उठे और बैठेहै वो मलका कि सुबुक-बार उठे और बैठे
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
ना'त-ओ-मनक़बत
ज़िक्र-ए-सरकार की महफ़िल को सजाया जाएकिस क़दर इश्क़ है इन से ये बताया जाये
नक़ीब-उल-रहमान हसनी
ग़ज़ल
जुनूँ वज्ह-ए-शिकस्त-ए-रंग-ए-महफ़िल होता जाता हैज़माना अपने मुस्तक़बिल में दाख़िल होता जाता है
सीमाब अकबराबादी
ना'त-ओ-मनक़बत
आक़ा तेरी महफ़िल का है रँग जुदा-गानाहम ने तो जिसे देखा देखा तिरा दीवाना
