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बैत
ख़याल आया था वहशत में हमें किस पाक-दामाँ का
ख़याल आया था वहशत में हमें किस पाक-दामाँ काग़िलाफ़-ए-का'बा हर टुकड़ा बना अपने गरेबाँ का
शाह अकबर दानापूरी
बैत
हमारे ख़ून का धब्बा क्यूँ रहे क़ातिल के दामन पर
हमारे ख़ून का धब्बा क्यूँ रहे क़ातिल के दामन परमिस्ल मशहूर है ये ख़ून जिस का उन के गर्दन पर
मख़दूम सज्जाद पाक
ना'त-ओ-मनक़बत
अली हुसैन अशरफ़ी
ना'त-ओ-मनक़बत
तुम्हारी ज़ात है वो पाक ज़ात या-वारिसकि जिस में सब हैं ख़ुदा की सिफ़ात या-वारिस
एजाज़ वारसी
ना'त-ओ-मनक़बत
अमीर बख़्श साबरी
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सूफ़ी लेख
क़व्वाली ग्यारहवीं शरीफ़ और हज़रत ग़ौस पाक के चिल्लों पर
ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती के चिल्लों पर क़व्वाली के रिवाज और उसकी मक़्बूलियत के बाद हिन्दोस्तान में
अकमल हैदराबादी
क़िता'
जुनून-ए-'आशिक़ी में अपना दामन चाक कर लेतेग़म-ए-कौन-ओ-मकाँ से अपने दिल को पाक कर लेते
फ़ना बुलंदशहरी
ना'त-ओ-मनक़बत
कामिल शत्तारी
सूफ़ी कहावत
आन रा कि हिसाब पाक अस्त अज़ मुहास्बा चे: बाक अस्त
जिसके हिसाब-किताब साफ़ हैं, उसे क्यों डरना
वाचिक परंपरा
सूफ़ी कहावत
दिल कि पाक अस्त, ज़ुबां बेबाक अस्त।
जब किसी की आत्मा शुद्ध होती है, तो उसकी ज़ुबां भयरहित होती है।
वाचिक परंपरा
ना'त-ओ-मनक़बत
मोरे प्यारे मोहम्मद प्यारे नबी मुझे पाक जमाल दिखाओ जीमोहे बिरह अगन ने फूक दिया अब इतना न तरसाओ जी
नियाज़ वज़ीराबादी
ना'त-ओ-मनक़बत
महशर में अगर उठ्ठूँ दामन में छुपा जानाजो अश्क बहे मेरे रहमत से मिटा जाना
सय्यद अमजद हुसैन
ना'त-ओ-मनक़बत
अनवार बरसते हैं उस पाक नगर की राहों मेंइक कैफ़ का 'आलम होता है तैबा की मस्त हवाओं में
वासिफ़ अली वासिफ़
ना'त-ओ-मनक़बत
अ'ब्दुल सत्तार नियाज़ी
सूफ़ी उद्धरण
पाक वो नहीं हैं, जो अपना जिस्म धो कर बैठ जाते हैं। पाक वो हैं कि जिन के अन्दर ख़ुदा रहता है।
पाक वो नहीं हैं, जो अपना जिस्म धो कर बैठ जाते हैं। पाक वो हैं कि जिन के अन्दर ख़ुदा रहता है।
