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दिल
दिल
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ग़ज़ल
क्या शिकवा हमें ऐ दिल हम पर आवाज़ें जो दुनिया कसती हैअब ख़ुद ही हमारी हालत पर तक़दीर हमारी हँसती है
नियाज़ मकनपुरी
ग़ज़ल
ज़िंदगी क्या है जो दिल हो तिश्ना-ए-ज़ौक़-ए-फ़नाया'नी ये पर्दा तो उठ सकता है आसानी के साथ
अख़्तर अलीगढ़ी
शे'र
जो दिल हो जल्वा-गाह-ए-नाज़ इस में ग़म नहीं होताजहाँ सरकार होते हैं वहाँ मातम नहीं होता
कामिल शत्तारी
शे'र
जो दिल हो जल्वा-गाह-ए-नाज़ इस में ग़म नहीं होताजहाँ सरकार होते हैं वहाँ मातम नहीं होता
कामिल शत्तारी
ग़ज़ल
जो दिल हो जल्वः-गाह-ए-नाज़ इस में ग़म नहीं होताजहाँ सरकार होते हैं वहाँ मातम नहीं होता
कामिल शत्तारी
कलाम
जो अहल-ए-दिल हैं वो हर दिल को अपना दिल समझते हैंमक़ाम-ए-'इश्क़ में हर गाम को मंज़िल समझते हैं
अमीर बख़्श साबरी
शे'र
पस-ए-मुर्दन इरादा दिल में था जो कू-ए-क़ातिल कालहद में ख़ुश हुआ मैं नाम सुनकर पहली मंज़िल का
ग़ाफ़िल लखनवी
ग़ज़ल
पस-ए-मुर्दन इरादा दिल में था जो कू-ए-क़ातिल कालहद में ख़ुश हुआ मैं नाम सुन कर पहली मंज़िल का
ग़ाफ़िल लखनवी
ना'त-ओ-मनक़बत
नबी के फ़ैज़ से वो दिल जो फ़ैज़याब नहींखिलेगा उस पे मसर्रत का कोई बाब नहीं

