आपकी खोज से संबंधित
परिणाम "safed-posh"
अत्यधिक संबंधित परिणाम "safed-posh"
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
ऐ दस्तत अज़ निगार सफेद-ओ-स्याह-ओ-सुर्ख़वे चश्मत अज़ ख़ुमार सफ़ेद-ओ-स्याह-ओ-सुर्ख़
अमीर ख़ुसरौ
शब्दकोश से सम्बंधित परिणाम
पुस्तकें के संबंधित परिणाम "safed-posh"
अन्य परिणाम "safed-posh"
ग़ज़ल
जल्वः-आरा कौन बे-पर्दः ये पर्दः-पोश हैज़र्रः ज़र्रः बज़्म-ए-हस्ती का जो अब मदहोश है
हैरत शाह वारसी
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
तुर्क-ए-सफ़ेद-रूए- व सियह-चश्म-ओ-लालः-रंगमिस्लत नज़ाद मादर-ए-अय्याम शोख़-ओ-शंग
अमीर ख़ुसरौ
बैत
यही बेहतर है कि तू पर्दा में रू-पोश रहे
यही बेहतर है कि तू पर्दा में रू-पोश रहेबरमला मुँह को दिखा दे तो किसे होश रहे
अज्ञात
ग़ज़ल
मिरी हस्ती का जल्वों में तिरे रू-पोश हो जानायहीं तो है बस इक क़तरा का दरिया नोश हो जाना
अफ़क़र मोहानी
सूफ़ी उद्धरण
मुरीद और पीर का संबंध ऐसा है, जैसे कपड़े में पैबन्द। सच्चा मुरीद, पीर के कहने पर चलता है और उस की मिसाल सफ़ेद कपड़े में लगे सफ़ेद पैबन्द की है, जो धोने पर धुल जाता है और असली कपड़े में ही मिल जाता है। पीर को पहुँचने वाला रूहानी फ़ैज़ ऐसे मुरीद को भी पहुँचता है। रस्मी मुरीद की मिसाल ऐसी है, जैसी सफ़ेद कपड़े पर काला पैबन्द। जिसे पीर का फ़ैज़ तो मिलता है, मगर असली चीज़ कम ही हाथ आती है। रस्मी मुरीद, अगर नेक होगा तो उस वजह से जाना जाएगा और बुरा होगा तो पीर के तुफ़ैल बख़्शा जाएगा। ये दौलत भी कम नहीं है। बहरहाल! पीर ज़रूर होना चाहिए।
मुरीद और पीर का संबंध ऐसा है, जैसे कपड़े में पैबन्द। सच्चा मुरीद, पीर के कहने
शैख़ हुसामुद्दीन मानिकपुरी
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
रफ़्ती अज़ पेश-ए-मन व नक़्श-ए-तू अज़ पेश न-रफ़्तकीस्त कू दीद ब-रुख़सार-ए-तू व ज़े-ख़्वेश न-रफ़्त