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ग़ज़ल
ऐ दिल-ए-ग़फ़ल-तज़दा बेदार हो सोता है क्याउ'म्र आख़िर हो चुकी अब देखे होता है क्या
शाह तुराब अली क़लंदर
ग़ज़ल
मोहब्बत बिकती हो गर शहर में ऐसी दुकाँ ढूँढेंकुदूरत दिल की धुलती हो जहाँ ऐसी दुकाँ ढूँढें




