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सूफ़ी उद्धरण
दरवेशों की हड्डियों में, इश्क़-ए-इलाही के चलते अनगिनत सुराख़ होते हैं।
दरवेशों की हड्डियों में, इश्क़-ए-इलाही के चलते अनगिनत सुराख़ होते हैं।
शैख़ सलीम चिश्ती
ग़ज़ल
ऐ ख़ास-ए-महबूब-ए-ख़ुदा ब-निगर सू-ए-अहवाल-ए-मनब-निगर ब-चश्म-ए-लुत्फ़-ए-ख़ुद ब-निगर सू-ए-अफ़’आल-ए-मन
अशरफ़ हुसैन अशरफ़ी
फ़ारसी कलाम
ऐ कि शर्ह-ए-वज़्ज़ुहा आमद जमाल-ए-रू-ए-तूनुक्तः-ए-वल्लैल वस्फ़-ए-ज़ुल्फ़-ए-'अम्बर बू-ए-तू
अमीर हसन अला सिज्ज़ी
सलाम
सलाम ऐ आमना के ला'ल शाह-ए-यूसुफ़-ए-सानीसलाम ए मज़्हर-ए-नूर-उल-हुदा ऐ ज़िल्ल-ए-सुब्हानी
मुज़फ़्फ़रुद्दीन साहेब
शे'र
नहीं बंदा हक़ीक़त में समझ असरार मा'नी काख़ुदी का वहम बरहम ज़न पिछे बे-ख़ुद ख़ुदाई कर
क़ादिर बख़्श बेदिल
ग़ज़ल
शाह अकबर दानापूरी
सूफ़ी उद्धरण
फ़क़ीरों को किसी से लड़ना नहीं चाहिए।
फ़क़ीरों को किसी से लड़ना नहीं चाहिए।