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शे'र
मक़्दूर क्या जो कह सुकूँ कुछ रम्ज़-ए-इ’श्क़ कोजूँ शम्अ' हूँ अगरचे सरापा ज़बान-ए-इ’श्क़
ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़
ग़ज़ल
ख़्वाजा शायान हसन
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सूफ़ी उद्धरण
इंसान को बाहरी नुक़सान से ज़्यादा असर नहीं पड़ता, उस की सबसे बड़ी दौलत दिल का सुकून और शांति है।
इंसान को बाहरी नुक़सान से ज़्यादा असर नहीं पड़ता, उस की सबसे बड़ी दौलत दिल का सुकून और शांति है।
सय्यद मोहम्मद ताजुद्दीन
ग़ज़ल
तू सुकूँ नहीं कि अमाँ नहीं तू दवा नहीं कि दु'आ नहींमिरी ज़िंदगी को बदल न दे तिरी कौन सी वो अदा नहीं
मंज़ूर आरफ़ी
ग़ज़ल
शमशाद शाद
शे'र
कश्ती है सुकूँ की मौजों में इतना ही सहारा काफ़ी हैमेरे लिए तो ऐ जान-ए-जहाँ बस नाम तुमहारा काफ़ी है
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
ग़ज़ल
बे-सुकूनी में सुकून-ए-क़ल्ब है हासिल मुझेइज़्तिराब-ए-दिल नहीं है इज़्तिराब-ए-दिल मुझे
