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ग़ज़ल
ये जो लगा है तीर मुझे ऐ कमान-ए-इश्क़महशर में देखियो यही होगा निशान-ए-इश्क़
ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
गरदूँ सदफ़-ए-गौहर-ए-यक दान:-ए-इश्क़ अस्तख़ुर्शीद-ए-जहाँताब नगीँ-ख़ान:-ए-इश्क़ अस्त
साएब तबरेज़ी
फ़ारसी कलाम
ऐ चेहर:-ए-ज़ेबा-ए-तू रश्क-ए-बुतान-ए-आज़रीहर-चंद वस्फ़त मी-कुनम दर हुस्न ज़ाँ बाला-तरी
अमीर ख़ुसरौ
ग़ज़ल
बातें बना न इतनी ज़ाहिद तू बैठ जा करपाया है उस सनम को हम ने ख़ुदा ख़ुदा कर
ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़
शे'र
कहियो ऐ क़ासिद पयाम उस को कि तेरे हिज्र सेजाँ-ब-लब पहुँचा नहीं आता है तू याँ अब तलक

