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फ़ारसी सूफ़ी काव्य
ऐ दोस्त ब-हर मंज़िल हम-ख़ानः तुरा याबमदर किशवर-ए-जान-ओ-दिल जानानः तुरा याबम
हज़ीं ज़ैदपुरी
ना'त-ओ-मनक़बत
मसर्रत-केश वो गाम अपनी ज़िंदगी में हैशहंशाह-ए-दो-’आलम के जो ’इश्क़-ओ-आगही में है
मोहम्मद आसिफ़ नूरी
ना'त-ओ-मनक़बत
क्या कहूँ हिज्र है अच्छा कि विसाल अच्छा हैजिस में महबूब-ए-ख़ुदा ख़ुश हैं वो हाल अच्छा है
अरशद अमरोहवी
पद
चले मंजल दर मंजल आया बे-दर के मिसल
चले मंजल दर मंजल आया बे-दर के मिसलवहाँ हुई सो नक्कल व सकल तुम सुनो
गोंदा महाराज
ग़ज़ल
हम उस कूचे को जज़्ब-ए-शौक़ की मंज़िल समझते हैंदर-ए-जानाँ के हर ज़र्रा को अपना दिल समझते हैं
शफ़क़ इमादपुरी
ग़ज़ल
क्यूँ न ख़ुश हूँ मौत आई मुझ को मंज़िल के क़रीबजान परवाना की निकली शम्अ'-ए-महफ़िल के क़रीब
अफ़क़र मोहानी
ग़ज़ल
मा-वरा हैं दोस्त मेहर-ओ-माह की मंज़िल से हमदहर पर खिलते तो हैं लेकिन बड़ी मुश्किल से हम
अदीब सहारनपुरी
कलाम
बुतान-ए-माह-वश उजड़ी हुई मंज़िल में रहते हैंकि जिस की जान जाती है उसी के दिल में रहते हैं
