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कलाम
ग़ैरत-ए-'इश्क़ क्या करूँ शौक़ की कश्मकश में हूँवो है कि पूछते नहीं दिल है कि मानता नहीं
सबा अकबराबादी
कलाम
इसी कश्मकश में गुज़रीं मिरी ज़िंदगी की रातेंकभी सोज़-ओ-साज़-ए-'रूमी' कभी पेच-ओ-ताब-ए-'राज़ी'
अल्लामा इक़बाल
कलाम
न ख़ुश आता है सहरा और न दिल बस्ती में लगता हैये कैसी कश्मकश में जान है और कैसी मुश्किल है