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कलाम
कोई अजनबी-सा दयार था यही वक़्त होगा पहल गएसर-ए-रह-गुज़र वो नज़र मिली तो फ़ज़ा में फूल बिखर गए
अज्ञात
कलाम
अगर ऐ नसीम-ए-सहर तिरा हो गुज़र दयार-ए-हिजाज़ मेंमिरी चश्म-ए-तर का सलाम कहना हुज़ूर-ए-बंदा-नवाज़ में
अख़्तर शीरानी
कलाम
लुभाता है निहायत दिल को ख़त-ए-रुख़्सार-ए-जानाँ काघसीटेगा मुझे काँटों में सब्ज़ा उस गुलिस्ताँ का
अज्ञात
कलाम
फिर बहार आई चमन में ज़ख़्म-ए-दिल आए हुएफिर मिरी दाग़-ए-जुनूँ आतिश की पर काले हुए
इमाम बख़्श नासिख़
कलाम
दिल जिगर को आश्ना-ए-दर्द-ए-उल्फ़त कर दियाइक निगाह-ए-नाज़ ने सामान-ए-राहत कर दिया
अब्दुल हादी काविश
कलाम
शौक़ से ना-कामी की बदौलत कूचा-ए-दिल भी छूट गयासारी उमीदें टूट गईं दिल बैठ गया जी छूट गया
फ़ानी बदायूँनी
कलाम
ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाएमंज़िल के लिए दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाए
बहज़ाद लखनवी
कलाम
वही आबले हैं वही जलन कोई सोज़-ए-दिल में कमी नहींजो लगा के आग गए हो तुम वो लगी हुई है बुझी नहीं