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कलाम
हर नक़्शा किस से हक़ के सिवा मुम्किनात काहर फ़र्द है जहाँ में आईना ज़ात का
मिर्ज़ा मोहम्मद अली फ़िदवी
कलाम
वो हक़ के साथ राबिता-ए-दिल नहीं रहामज्ज़ूब उस लक़ब ही के क़ाबिल नहीं रहा
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
कलाम
दीद-ए-जमाल-ए-हक़ हुई हुस्न-ए-निगार देख करबन गए बुत-परस्त हम सूरत-ए-यार देख कर
शब्बीर साजिद मेहरवी
कलाम
बंदगी और हक़-परस्ती कुछ न होना है 'नियाज़'कुछ न होने के सिवा और हक़-परस्ती कुछ नहीं
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
कलाम
दर्शन सिंह
कलाम
ख़ुदी से बे-ख़ुदी में आ जो शौक़-ए-हक़-परसती हैजिसे तू नीस्ती समझा है ऐ ग़ाफ़िल वो हस्ती है
अमीर मीनाई
कलाम
दौड़ आके तब चले जब जोड़ पीछे हो मददउस दक़ीक़े को वही पहुँचे जो हक़ आगाह हो
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
कलाम
ज़िक्र हक़ से दिल को तुम वासिल ब-हक़ कर दो 'शरफ़'नाम ले-ले कर ख़ुदा का बा-ख़ुदा हो जाएगा
अब्दुल क़ादिर शरफ़
कलाम
कोई शुग़्ल-ए-नीस्ती में नीस्त-ओ-नाबूद हैकोई नज़्ज़ारा में हक़ के इक तमाशा-तौर है
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
कलाम
क्या ही जी को भाई हैं बातें ये तेरी ऐ 'नियाज़'क़ौल-ए-हक़ तो हम समझते हैं मियाँ तेरा कहा
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
कलाम
जुनून-ए-आगही हूँ शोरिश-ए-हक़्क़-ए-सदाक़त हूँमैं 'इरफ़ान-ए-मोहब्बत हूँ मैं तूफ़ान-ए-मसर्रत हूँ
धर्म सरूप
कलाम
बू-ए-अहमद है कहीं और कहीं रंग-ए-अ'लीये कुछ कमी गुलशन-ए-ज़हरा के गुलाबों में नहीं