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कलाम
मुझे अब देख कर अबर-ए-शफ़क़-आलूदा याद आयाकि फ़ुर्क़त में तिरी आतिश बरसती थी गुलिस्ताँ पर
मिर्ज़ा ग़ालिब
कलाम
रवाँ रखता है ख़ून आँखों से हिज्र इक माह-ए-ताबाँ काशफ़क़-आलूदा रहता है हिलाल अपने गरेबाँ का
अज्ञात
कलाम
तरब आश्ना-ए-ख़रोश हो तू नवा है महरम-ए-गोश होवो सरोद क्या कि छुपा हुआ हो सुकूत-ए-पर्दा-ए-साज़ में
अल्लामा इक़बाल
कलाम
अख़्तर शीरानी
कलाम
आईना-ए-’अली को देख हुस्न-ए-मोहम्मदी को देखकर के निसार जान-ए-वतन 'आशिक़-ए-सरफ़राज़ बन
शाह मोहसिन दानापुरी
कलाम
मंज़ूर आरफ़ी
कलाम
ऐ जान-ए-जहाँ कब तक ये गोशा-ए-तन्हाईसब दीद के तालिब हैं जितने हैं तमाशाई