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कलाम
घनी शाख़ों में छुप कर जब कोई चिड़िया चहकती हैतो मेरे दिल में क्यूँ हसरत की चिंगारी भड़कती है
अहमद नदीम क़ासमी
कलाम
शैख़-जी तशरीफ़ यूँ बहर-ए-ज़ियारत ले चलेलब पे तौब: उन बुतों की दिल में उल्फ़त ले चले
औघट शाह वारसी
कलाम
जिसे दीद तेरी नसीब हो वो नसीब क़ाबिल-ए-दीद हैकि शब-ए-बरात है रात उसे दिन उस के वास्ते 'ईद है
अश्क रामपुरी
कलाम
सवाल-ए-बोसा पर क्यूँ झिड़कियाँ देते हो 'अकबर' को'फ़ला-तनहर' कलाम-उल-लाह में अज़ बह्र-ए-साइल है
अकबर लखनवी
कलाम
नाचार बहर-ए-चारा चला आया सर-निगूँवर्ना मैं मुँह दिखाने के क़ाबिल नहीं रहा