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‘अमीर’ अब कहाँ शे'र में कोई कामिलरही है तो इक बह्र-ए-कामिल रहि है
दामन से हम अपने दाग़-ए-हस्तीआब-ए-ख़ंजर से धो रहे हैं
ज़र्रा ज़र्रा दुर्द-ए-मय का ज़ाहिदोदूरबीं है चश्म-ए-बातिन के लिए
हल्क़ा-ए-चश्म वक़्त-ए-नज़अ' नहींहै ये छल्ला तिरी निशानी का
बना कर दिखाए मिरे दर्द-ए-दिल नेतह-ए-आसमाँ आसमाँ कैसे कैसे
नहीं कुछ तेग़-ए-क़ातिल ही कशीदाख़फ़ा है मुझ से मर्ग-ए-ना-गहाँ तक
शरीक-ए-हाल-ए-'आशिक़ बे-कसी में कौन होता हैजो निकली भी तो कुछ दिल-सोज़ आह-ए-आतिशीं निकली
सब आफ़तों से छूट गया कर के तर्क-ए-हिर्सक्यूँ-कर न हो मुझे दिल-ए-बे-आरज़ू पसंद
यार मुख़्तार है जो चाहे करे हम से 'अमीर'गर्दन-ए-'इज्ज़ तह-ए-तेग़-ए-रज़ा रक्खी है
अ'र्सा-ए-हस्ती-ओ-तूल-ए-शब-ए-गोर-ओ-मह्शरबो'द है बंदा-ओ-रब में अभी मैदानों का
ताबे'-ए-दीन कभी दौलत पे न शैदा होगापैरव-ए-शेर-ए-ख़ुदा क्या सग-ए-दुनिया होगा
महरम-ए-राज़ तो बहुत हैं 'अमीर'जिस को कहते हैं राज़-दाँ तू है
रुख़-ए-जानाँ का मुयस्सर जो नज़ारा होतामहर-ए-ताबाँ मिरी क़िस्मत का सितारा होता
क़तरा-ए-अश्क बने गौहर-ए-गोश-ए-जानाँआबरू इतनी तो ऐ दीदा-ए-तर पैदा कर
साक़ी न दिखा बहर-ए-ख़ुदा साग़र-ए-ख़ालीलबरेज़ हुआ जाता है पैमाना किसी का
मैं पुराना मस्त हूँ जन्नत मेरा काशाना थाहूर साक़ी चश्मा-ए-कौसर मिरा पैमाना था
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