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कलाम
मुल्ला आरिफ़ ख़ैराबादी
कलाम
क्या कहूँ तारीकी-ए-ज़िन्दान-ए-ग़म अँधेर हैपम्बा नूर-ए-सुब्ह से कम जिस के रौज़न में नहीं
मिर्ज़ा ग़ालिब
कलाम
फ़ना बुलंदशहरी
कलाम
सच है शह-रग से क़रीं अल्लाह मियाँ है रे मियाँतुझ में ये माद्दा समझने का कहाँ है रे मयाँ
अज़ीज़ुद्दीन रिज़वाँ क़ादरी
कलाम
उस की ख़ुश्बू के जो ख़्वाहाँ थे क्यूँ न हुएतालिब-ए-बोसा-ए-रुख़ ज़ुल्फ़-ए-दोता क्यूँ न हुए
मुबारक हुसैन मुबारक
कलाम
आईना-ए-’अली को देख हुस्न-ए-मोहम्मदी को देखकर के निसार जान-ए-वतन 'आशिक़-ए-सरफ़राज़ बन
शाह मोहसिन दानापुरी
कलाम
मर जाऊँगा ’इश्क़-ए-शह-ए-ख़ादिम में मैं 'आसिम'मेरे लिए इस दहर में बस नाम यही है
शाह इनायातुलाह सफ़ीपुरी
कलाम
मुझ ‘आसिम-ए-बे-दिल से जो पूछेंगे कहूँगाहम तो शह-ए-ख़ादिम के तलब-गार हैं यारो