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कलाम
लेकर जहाँ के हुस्न को शम्स-ओ-क़मर को क्या करूँमुझ को तो तुम पसंद अपनी नज़र को क्या करूँ
अब्दुल हादी काविश
कलाम
औज-ए-विलायत के हो माह तख़्त-ए-ख़िलाफ़त के हो शाहदीन-ए-मोहम्मद की पनाह ऐ बादशाह-ए-अस्फ़िया
फ़क़ीर क़ादरी
कलाम
शक्ल-ए-अहमद है हक़ीक़त में अहद की सूरतपर्दा-ए-मीम पड़ा था मुझे मा'लूम न था
शाह फ़िदा हुसैन फ़य्याज़ी
कलाम
मोहम्मद बादशाह क़दीर
कलाम
क़ुर्बान-ए-फ़ना एक तजल्ली-ए-तेरी होएज़ुल्मत-कदा-ए-हस्तती-ए-मौहूम से निकले
मिर्ज़ा मोहम्मद अली फ़िदवी
कलाम
तुम्हें मैं जानता हूँ तुम बदलते हो हज़ारों रंगनहीं मैं ग़ैर उठा कर पर्दा-ए-रू-ए-बशर आओ
आग़ा मोहम्मद दाऊद
कलाम
उस की ख़ुश्बू के जो ख़्वाहाँ थे क्यूँ न हुएतालिब-ए-बोसा-ए-रुख़ ज़ुल्फ़-ए-दोता क्यूँ न हुए
मुबारक हुसैन मुबारक
कलाम
यही इरशाद-ए-मुर्शिद है यही तो राज़-ए-मुर्शिद हैमुराद पाया मेरा नफ़्स-ए-’अदू-ए-बे-शरम मेरा
मोहम्मद बादशाह क़दीर
कलाम
लब्ब-ए-लुबाब-ए-जुमला कमालात-ए-'इश्क़ हैमुम्किन नहीं कि 'इश्क़ भी हो औलिया न हो