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कलाम
ऐ 'ज़फ़र' ये दिल प मेरे दाग़ कैसा रह गयाख़ाना-ए-बाग़-ए-यार में ख़ल्क़-ए-ख़ुदा थी मैं न था
मिर्ज़ा अबुल मुज़फ़्फ़र
कलाम
ऐ शैख़-ए-शर’अ तुम को रवा पंडितों को दीदतुम जानते नहीं हो अगर सुर्ख़ और सफ़ेद
असरारुल्लाह शाह ग़ौसी
कलाम
ऐ शो’ला-ए-जवाला जब से लौ तुझ से लगाए बैठे हैंइक आग लगी है सीने में और सब से छुपाए बैठे हैं
कामिल शत्तारी
कलाम
मोहम्मद बादशाह क़दीर
कलाम
क़ुर्बान-ए-फ़ना एक तजल्ली-ए-तेरी होएज़ुल्मत-कदा-ए-हस्तती-ए-मौहूम से निकले
मिर्ज़ा मोहम्मद अली फ़िदवी
कलाम
दाग़-ए-दिल ज़ख़्म-ए-जिगर दीदा-ए-ख़ून-नाब-फ़िशाँहम भी आए हैं दर-ए-यार से क्या क्या ले कर
कामिल शत्तारी
कलाम
तुम्हें मैं जानता हूँ तुम बदलते हो हज़ारों रंगनहीं मैं ग़ैर उठा कर पर्दा-ए-रू-ए-बशर आओ