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कलाम
हाथ क्यूँ बाँधे मिरे छल्ला अगर चोरी गयाये सरापा शोख़ी-ए-दुज़्द-ए-हिना थी मैं न था
मिर्ज़ा अबुल मुज़फ़्फ़र
कलाम
ऐ शो’ला-ए-जवाला जब से लौ तुझ से लगाए बैठे हैंइक आग लगी है सीने में और सब से छुपाए बैठे हैं
कामिल शत्तारी
कलाम
मोहम्मद बादशाह क़दीर
कलाम
क़ुर्बान-ए-फ़ना एक तजल्ली-ए-तेरी होएज़ुल्मत-कदा-ए-हस्तती-ए-मौहूम से निकले