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कलाम
कमर बाँधे हुए चलने को याँ सब यार बैठे हैंबहुत आगे गए बाक़ी जो हैं तय्यार बैठे हैं
इन्शा अल्लाह ख़ान
कलाम
हाँ हाँ तिरी सूरत हसीं लेकिन तू ऐसा भी नहींइक शख़्स के अशआ'र से शोहरा हुआ क्या क्या तिरा
इब्न-ए-इंशा
कलाम
बे-अदबाँ न सार अदब दी गए अदब थीं वांजे हूजेहड़े होण मिट्टी दे भांडे कदी न थीवण कांजे हू
सुल्तान बाहू
कलाम
जितनी ज़बानें उतने क़िस्से अपनी उदासी के कारनलेकिन लोग अभी तक ये सादा सी पहेली बूझ न पाए
इब्न-ए-इंशा
कलाम
शाह मोहसिन दानापुरी
कलाम
ये कैसे बाल बिखरे हैं बनी सूरत है क्यूँ ग़म कीख़बर पाई है बतलाओ तो किस दुश्मन के मातम की
एम. एस. जौहर
कलाम
क्या डर उन्हें दुनिया का 'काविश' हो ज़माने मेंजो फ़ातिह-ए-ख़ैबर के कहलाते हैं शैदाई