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कलाम
सच है शह-रग से क़रीं अल्लाह मियाँ है रे मियाँतुझ में ये माद्दा समझने का कहाँ है रे मयाँ
अज़ीज़ुद्दीन रिज़वाँ क़ादरी
कलाम
ग़ुबार-ए-आस्ताँ हर रोज़ झाड़े मेहर-ए-मिज़्गाँ सेबिछाए माह हर शब चादर-ए-शफ़्फ़ाफ़ का'बा में
हाजी वारिस अली शाह
कलाम
आईना-ए-’अली को देख हुस्न-ए-मोहम्मदी को देखकर के निसार जान-ए-वतन 'आशिक़-ए-सरफ़राज़ बन
शाह मोहसिन दानापुरी
कलाम
मर जाऊँगा ’इश्क़-ए-शह-ए-ख़ादिम में मैं 'आसिम'मेरे लिए इस दहर में बस नाम यही है
शाह इनायातुलाह सफ़ीपुरी
कलाम
वही जो चाहे तो हो इंतिज़ाम-ए-हिन्दोस्तानकरे जो ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ का अपने बंद-ओ-बस्त
शाह तुराब अली क़लंदर
कलाम
फ़रेफ़्ता हूँ मैं जिस पर वो है फ़िदा मुझ परये हुस्न-ए-तालि’-ओ-बख़्त-ए-सई’द है मेरा