परिणाम "jigar"
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बर्मा के मिरे दिल को जिगर तक उतर आईंक्या काम लिया नीची निगाहों से हया ने
दिल उड़ा ग़ैर का आ'शिक़ का जिगर छोड़ दियातुम ने ऐ जान-ए-जहाँ तीर किधर छोड़ दिया
मरहम-ए-वस्ल-ए-दिलरुबा लाऊँ कहाँ से ऐ ख़ुदाचारा-गरी से तंग हूँ ज़ख़्म-ए-जिगर को क्या करूँ
दिल जिगर को आश्ना-ए-दर्द-ए-उल्फ़त कर दियाइक निगाह-ए-नाज़ ने सामान-ए-राहत कर दिया
न मेरे दिल न जिगर पर न दीदः-ए-तर परकरम करे वो निशान-ए-क़दम तो पत्थर पर
सदमे उल्फ़त के उठाने हैं इलाही मुश्किलदिल अगर एक दिया लाख जिगर पैदा कर
लगी आग दिल में जिगर जल गयाग़ज़ब से किधर का किधर जल गया
साक़ी हूँ तिरी बज़्म में मैं तिश्ना जिगर भीसदक़े तिरी आँखों के कोई जाम इधर भी
दिल से तिरी निगाह जिगर तक उतर गईदोनों को इक अदा में रज़ा-मंद कर गई
कहीं सोज़-ए-जिगर में वो कहीं दर्द-ए-निहाँ हो करकहीं हैं वो किसी दिल में कहीं शोर-ओ-फ़ुग़ाँ हो कर
जान पे खेला हूँ मैं मेरा जिगर देखनाजी न रहे या रहे मुझ को इधर देखना
दिल में जिगर में आँख में बस तू ही तू रहेइस के सिवा न और कोई आरज़ू रहे
हैराँ हूँ दिल को रोऊँ कि पीटूँ जिगर को मैंमक़्दूर हो तो साथ रखूँ नौहागर को मैं
पहले न उड़ाया किसी बेकस के जिगर कोपर हम ने लगाए हैं तिरे तीर-ए-नज़र को
ख़ुशी में भूल न जाना जिगर ये राज़-ए-हयातकि जो ख़ुशी है यहाँ इक अमानत-ए-ग़म है
आँसू तो बहुत से हैं आँखों में 'जिगर' लेकिनबंध जाए सो मोती है रह जाए सो दाना है
हिज्र में छूट गया ख़ून-ए-जिगर खाने सेज़िंदगी हो गई गोया मिरी मर जाने से
या मज़ाक़-ए-दीद की तोहमत न लेते ऐ 'जिगर'या मुजस्सम दिल सरापा आँख बन कर देखते
आदमी आदमी से मिलता हैदिल मगर कम किसी से मिलता है
इस जान-ए-मय-कदा की क़सम बारहा 'जिगर'कल ’आलम-ए-बसीत पे मैं छा के पी गया
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