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कलाम
ज़िंदगी एक किराए का घर है इक न इक दिन बदलना पड़ेगामौत जब तुझ को आवाज़ देगी घर से बाहर निकलना पड़ेगा
क़ैसर सिद्दीक़ी समस्तीपुरी
कलाम
हर इक 'आशिक़ नए अंदाज़ से क़ुर्बान-ए-क़ातिल थाक़तील-ए-तेग़-ए-बे-सर था शहीद-ए-नाज़-ए-बे-दिल था
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
कलाम
तेरा नाज़ुक बदन भाई जो लेटे सेज फूलों परहोवेगा एक दिन मुर्दार कर माने ये खाना है
मौलाना ग़ुलाम रसूल
कलाम
कोई मस्त-ए-चश्म-ए-साक़ी कोई है शहीद-ए-ग़म्ज़ाहर बादा-कश की हालत यहाँ एक सी नहीं है
शाह अलीमुल्लाह सफ़ी
कलाम
एक 'आलम है कि मक़्तल में है क़ातिल की तरफ़धार ख़ंजर की फ़क़त ’आशिक़-ए-बे-दिल की तरफ़
आसी गाज़ीपुरी
कलाम
गो देख चुका हूँ पहले भी नज़्ज़ारा दरिया-नोशी काएक और सला-ए-’आम कि साक़ी रात गुज़रने वाली है