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कलाम
टुक साथ हो हसरत दिल-ए-मरहूम से निकले'आशिक़ का जनाज़ा है ज़रा धूम से निकले
मिर्ज़ा मोहम्मद अली फ़िदवी
कलाम
हर इक 'आशिक़ नए अंदाज़ से क़ुर्बान-ए-क़ातिल थाक़तील-ए-तेग़-ए-बे-सर था शहीद-ए-नाज़-ए-बे-दिल था
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
कलाम
फड़क कर मुर्ग़-ए-बिस्मिल की तरह 'आशिक़ जो मरते हैंये मक़्तल हैं 'अरूस-ए-तेग़ के सदक़े उतरते हैं
अमीर मीनाई
कलाम
ग़ौस क़ुतुब न उरे उरेरे आशिक़ जाण अगेरे हूजेहड़े मंज़िल आशिक़ पहुंचण ग़ौस न पावण फेरे हू
सुल्तान बाहू
कलाम
दस्त-ए-अनवर पे हुए हज़रत-ए-मूसा 'आशिक़लब-ए-जाँ-बख़्श के हैं ख़िज़्र-ओ-मसीहा 'आशिक़
शाह फ़ाइक़ शहबाज़ी
कलाम
हाए साक़ी ये हो सामाँ और आशिक़ वाँ न होयार था सब्ज़ा था बदली थी हवा थी मैं न था
मिर्ज़ा अबुल मुज़फ़्फ़र
कलाम
आशिक़ इश्क़ माही दे कोलों फिरन हमेशा खीवे हूजींदे जान माही नूँ डित्ती दोहीं जहानीं जीवे हू
सुल्तान बाहू
कलाम
आशिक़ हो ते इश्क़ कमा दिल रक्खीं वांग पहाड़ाँ हूसै सै बदियाँ लक्ख उलाहमें, जाणीं बाग़-बहाराँ हू
सुल्तान बाहू
कलाम
ढूँढ उस जगह किशवर-ए-’अली बाब-ए-’इल्म है’उक़्दा वहीं से होवे है हल मुश्किलात का
मिर्ज़ा मोहम्मद अली फ़िदवी
कलाम
आशिक़ राज़ माही दे कोलों, होण कदीं न वांदे हूनींद हराम तिन्हाँ ते जेहड़े ज़ाती इस्म कमांदे हू